”इक कली गुलाब क़ी”

''इक कली गुलाब क़ी''

इक कली गुलाब क़ी,
धूप में खिली !
पर,
धूप की तपिश ने,
उसको इस कदर झुलसा दिया !
क़ि उसने अपना,
अस्तित्व खो दिया ।

खिलने से पहले ही,
वो मुरझा गयी !
इस कदर मुरझा गयी,
क़ि वो फूल ना बन सकी ।
इक कली गुलाब क़ी……

इतने पर भी,
दर्द थमा नहीं !
ज़ालिम हवाओं,
क़े झोंकों ने,
इस कदर क़हर बरपाया,
क़ि एक-एक करके,
सभी पत्तियाँ, बिख़र गयी ।

इतना ही नहीं !
कोई पत्ती !
पाँव तले दब गई, तो
कोई मलबे में समा गई ।
वो पूर्ण अस्तित्व में,
आने से पहले ही,
नष्ट हुयी…नष्ट हुयी……!
इक कली गुलाब क़ी……
–अभिषेक कुमार झा ”अभी”
+91-9953678024

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20 विचार “”इक कली गुलाब क़ी”&rdquo पर;

  1. ये हक़ीक़त है न फसाना कोई
    कि बहार आई थी घर जलाने के लिये
    हर राह मक़तल की तरफ़ जाती नज़र आती है
    कि रोशनी आई है चरागों को बुझाने के लिये

    मक़तल -क़त्ल करने की ज़गह

    अज़ीज़ जौनपुरी

    • सम्मानित ”अज़ीज़ जौनपुरी” जी
      बहुत ही उत्कृष्ट पंक्तियाँ साझा की है आपने।
      सादर आभार

      मुझे भी ”नवाब देवबंदी” साहब का एक मुक्तक याद आ गया :

      ”जलते घर को देखने वालों , फूँस का छप्पर आपका है।
      आग़ के पीछे तेज़ हवा है, आगे मुकद्दर आपका है।
      उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नंबर अब आया,
      मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं, अगला नंबर आपका है।

  2. एक अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना ! काश किसी कली के साथ ऐसा न हो ! उसे पूर्णरूप से खिलने, विकसित होने और अपने सौंदर्य और सौरभ से सबको मुग्ध करने का अवसर मिले !

  3. श्री झा जी,सादर अभिवादन |
    मार्मिक चित्रण ,हर कली कों फूल बनने जो प्राकृतिक नियम हैं ,वों बना रहे …यदि कोई किसी कों जीवन दे नही सकता तो लेने का/वंचित करने का अधिकार भी नही |

    • सम्मानित डॉ अजय जी,
      रचना के सन्दर्भ से लेकर जो व्यवहारिक सन्दर्भ तक आपने बात कही उत्कृष्ट है।
      मैं भी सभी चेतनशील मनुष्यों से यही उम्मीद और आशा करता हूँ, कि जब जीवन
      देने का काम उनके हाथ में नहीं है, तो जीवन ले भी ना।
      आपका हार्दिक धन्यवाद
      सादर

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