द्वंद

द्वंद

ख़ुद से जंग, छिड़ी है
ये आफ़त बहुत बड़ी है।
कहना मानू ज़ेहन क़ा,
तो मन वैर करता है !
मन का कहना मानू,
तो बार-बार,
ये टूटता है।

ख़ुद को अब कैसे संभालूँ ?
जिंदगी कठिनाइयों से भरी है।

बड़े बड़े ज्ञानी को जब,
आज मैं देखता हूँ !
ज्ञान बाँटता दूसरों को,
वो ख़ुद क्यूँ नहीं,
अमल करता है ?

देश का रक्षक,
भक्षक बन,
मद में चूर फिरता है।
जिसको बनाओ,
देश का कर्ता !
वो देश,
संहार करता है।

कलयुग,
कैसा ये प्रकोप तेरा ?

जितना बोले झूठ जो,
उतनी उन्नति करता है।
इंसानियत का भरे बाज़ार,
आज क़त्ल-ए-आम होता है।

उठो, जागो और अब जगाओ,
अपने आप को समझो !
हम में ही रावण,
हम में ही राम बसता है…
हम में ही राम बसता है…

–अभिषेक कुमार झा ”अभी”.
+91-9953678024

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8 विचार “द्वंद&rdquo पर;

  1. wahhh umda lekhan … shubhkamnaye :)..
    जितना बोले झूठ जो,
    उतनी उन्नति करता है।
    इंसानियत का भरे बाज़ार,
    आज क़त्ल-ए-आम होता है।

    उठो, जागो और अब जगाओ,
    अपने आप को समझो !
    हम में ही रावण,
    हम में ही राम बसता है…
    हम में ही राम बसता है…

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