अफ़साना

अफ़साना

बचपन से सबको हम, समझते रहे अपना
जवानी में क़दम रखते ही, टूटा मेरा सपना

भौतिकवादी युग में, ना कोई रिश्ता बचा है
अपनी जीत वास्ते सबने, चक्रव्यूह रचा है
फँसे जो मुफ़्लसी में, तो उबरना मुश्किल है
पूरी उम्र फँसते जाओगे, ये ऐसा दलदल है
इस युग में भरोसा, जिसपे जितना ही रहेगा
सबसे बड़ा विश्वासघाती, आज वही बनेगा

कुआँ सामने होते भी, प्यास से मर रहा हूँ
कब्ज़ा जमाए हुए, दलालों को देख रहा हूँ

मतलब से दोस्ती मतलब से बनाए मसीहा
ग़रीबों के ज़िंदगी में, बोले ना कोई पपीहा
रहम नज़र से, देख अब तो, ओ मेरे खुदा
इंसान से इंसानियत यहाँ अब हो रहा ज़ुदा
रोते रोते आए थे, क्या रोते हुए ही जाना है
तुम ध्यान देना ‘अभी’ का यही अफ़साना है

–अभिषेक कुमार ”अभी”
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