अफ़साना

अफ़साना

बचपन से सबको हम, समझते रहे अपना
जवानी में क़दम रखते ही, टूटा मेरा सपना

भौतिकवादी युग में, ना कोई रिश्ता बचा है
अपनी जीत वास्ते सबने, चक्रव्यूह रचा है
फँसे जो मुफ़्लसी में, तो उबरना मुश्किल है
पूरी उम्र फँसते जाओगे, ये ऐसा दलदल है
इस युग में भरोसा, जिसपे जितना ही रहेगा
सबसे बड़ा विश्वासघाती, आज वही बनेगा

कुआँ सामने होते भी, प्यास से मर रहा हूँ
कब्ज़ा जमाए हुए, दलालों को देख रहा हूँ

मतलब से दोस्ती मतलब से बनाए मसीहा
ग़रीबों के ज़िंदगी में, बोले ना कोई पपीहा
रहम नज़र से, देख अब तो, ओ मेरे खुदा
इंसान से इंसानियत यहाँ अब हो रहा ज़ुदा
रोते रोते आए थे, क्या रोते हुए ही जाना है
तुम ध्यान देना ‘अभी’ का यही अफ़साना है

–अभिषेक कुमार ”अभी”
+91-9953678024

द्वंद

द्वंद

ख़ुद से जंग, छिड़ी है
ये आफ़त बहुत बड़ी है।
कहना मानू ज़ेहन क़ा,
तो मन वैर करता है !
मन का कहना मानू,
तो बार-बार,
ये टूटता है।

ख़ुद को अब कैसे संभालूँ ?
जिंदगी कठिनाइयों से भरी है।

बड़े बड़े ज्ञानी को जब,
आज मैं देखता हूँ !
ज्ञान बाँटता दूसरों को,
वो ख़ुद क्यूँ नहीं,
अमल करता है ?

देश का रक्षक,
भक्षक बन,
मद में चूर फिरता है।
जिसको बनाओ,
देश का कर्ता !
वो देश,
संहार करता है।

कलयुग,
कैसा ये प्रकोप तेरा ?

जितना बोले झूठ जो,
उतनी उन्नति करता है।
इंसानियत का भरे बाज़ार,
आज क़त्ल-ए-आम होता है।

उठो, जागो और अब जगाओ,
अपने आप को समझो !
हम में ही रावण,
हम में ही राम बसता है…
हम में ही राम बसता है…

–अभिषेक कुमार झा ”अभी”.
+91-9953678024

”शान हिन्दी”जान हिन्दी”

''शान हिन्दी''जान हिन्दी''

हिन्द देश की शान हिन्दी।
हिन्दुस्तां की जान हिन्दी।
दिखलाए अपनी संस्कृति,
हमसब की पहचान हिन्दी।

देखो कैसे घूँघट डाल के,
चली लगा माथे पे बिंदी।
सभ्यता की प्रथम किरण,
है जगाती अपनी हिन्दी।

हिन्द देश की शान हिन्दी।
हिन्दुस्तां की जान हिन्दी।

दूर सुदूर भी छाती आज,
डंका बजाती अपनी हिन्दी।
सदा प्रेम – भाईचारे का,
पाठ पढ़ती अपनी हिन्दी।

उमंग में हिंदी आज है,
आज तरंग में है हिन्दी।
हमें हिन्द पे नाज़ है,
हिन्द की नाज़ है हिन्दी।

हिन्द देश की शान हिन्दी।
हिन्दुस्तां की जान हिन्दी।
–अभिषेक कुमार झा ”अभी”

”इक कली गुलाब क़ी”

''इक कली गुलाब क़ी''

इक कली गुलाब क़ी,
धूप में खिली !
पर,
धूप की तपिश ने,
उसको इस कदर झुलसा दिया !
क़ि उसने अपना,
अस्तित्व खो दिया ।

खिलने से पहले ही,
वो मुरझा गयी !
इस कदर मुरझा गयी,
क़ि वो फूल ना बन सकी ।
इक कली गुलाब क़ी……

इतने पर भी,
दर्द थमा नहीं !
ज़ालिम हवाओं,
क़े झोंकों ने,
इस कदर क़हर बरपाया,
क़ि एक-एक करके,
सभी पत्तियाँ, बिख़र गयी ।

इतना ही नहीं !
कोई पत्ती !
पाँव तले दब गई, तो
कोई मलबे में समा गई ।
वो पूर्ण अस्तित्व में,
आने से पहले ही,
नष्ट हुयी…नष्ट हुयी……!
इक कली गुलाब क़ी……
–अभिषेक कुमार झा ”अभी”
+91-9953678024

”गुरु देवाय नमः”

''गुरु देवाय नमः''

मात-पिता से बढ़कर मान
गुरु प्रत्यक्ष, हैं भगवान् ।
कितने बड़े भी हो जाएँ,
सम्मुख ना हो अभिमान ।

गुरु हैं दीया, गुरु हैं बाती,
गुरु ही हैं, प्रकाश्यमान ।
मन से करते, तृष्णा का नाश,
ये जब देते, हैं दिव्य ज्ञान ।

मात-पिता से बढ़कर मान
गुरु प्रत्यक्ष, हैं भगवान् ।

गुरु ही नैया, गुरु ही नाविक,
गुरु ही करते भँवर से पार ।
इनपे जब पूर्ण आस्था होता,
कहीं भी हो जाते उदयमान ।

मात-पिता से बढ़कर मान
गुरु प्रत्यक्ष, हैं भगवान् ।

एकलव्य सा शिष्य बने, तो
गुरु, द्रोणाचार्य का मान बढ़े…
धर अंगूठा गुरु चरणों में,
बारम्बार प्रणाम करें…….।

ऐसे हम भी शिष्य बने,
जिससे बढ़े गुरु का मान ।
मात-पिता से बढ़कर मान
गुरु प्रत्यक्ष, हैं भगवान् ।

–अभिषेक कुमार झा ”अभी”
+91-9953678024

”मैं” और ”परछाई”

”मैं” और ”परछाई”

अक्सर बातें करते हैं ।
मेरी तन्हाई का,
सबसे बड़ा साथी है ।

हाँ ! मेरी परछाई……

ये अज़ब-गज़ब है,
उजाले में भाग जाता,
पर, अँधेरे में,…
साथ निभाता है ।
हाँ ! मेरी परछाई……

हर्ष-उल्लास,
दर्द-ग़म,
हर सम-विषम-
परिस्थिति में..!
शांत चित्त, गहन मुद्रा में,
सोचता रहता है ।
मेरे हर क्रिया-कलापों को,
देखता रहता है ।
हाँ ! मेरी परछाई……

अब तो !
बात करना भी सीख गया हूँ ।
हर अच्छे-बुरे में,
ये फ़र्क भी बताने लगा है ।
हाँ ! मेरी परछाई……
–अभिषेक कुमार झा ”अभी”
+91-9953678024